Tuesday, January 25, 2011

बरगद के बोनसाई मत बनाओ यार !!



हो सकता है इस घोषणा से कुछ लोग खुश हो सकते है . परन्तु नाराज होने वालो की तादात बड़ी होगी . एक दिन के अंतराल से खबर आई की फिल्म 'अंगूर' (गुलजार द्वारा लिखित व निर्देशित ) कालजयी रचना को पुन्ह बनाया जाएगा . इस बार नायक होंगे शाहरुख़ खान , तुषार कपूर व नायिका होंगी करीना. याद कीजिये 'अंगूर' और जेहन में तेर जाती है संजीव कुमार और देवेन वर्मा की मासूम जोड़ी.यही नहीं मौसमी चटर्जी , अरुणा ईरानी और दीप्ती नवल का बिंदास अभिनय . गुलजार का कसा हुआ स्क्रीन प्ले ,आर .डी. बर्मन के संगीत से सजी इस फिल्म को आसानी ने नहीं भुलाया जा सकता है. किसी भी कालजयी और ऐतिहासक फिल्म को दस बीस बरस के बाद फिर से बनाना दो बातो की और इशारा करता है . एक - मौजूदा फिल्मकारों के पास नए विषय नहीं है या वे नए विषय को लेकर रिस्क नहीं लेना चाहते है , दूसरा -शोर्ट कट से सफल होने की प्रवृति , गुजरे जमाने की सुपर हिट, या जन मानस में बसी फिल्म का रिमेक पहले दिन से ही जनचर्चा का विषय बन जाता है और फिल्म प्रेमियों में इस बात की उत्सुकता जगा देता है की वे पुरानी फिल्म की तुलना नयी फिल्म से करने लगते है . बस यही पर नए फिल्म कार को बेठे ठाले मुफ्त में प्रचार मिल जाता है . .

'अंगूर ' को इस बार रोहित शेट्टी डायरेक्ट करने वाले है. 'गोलमाल ' श्रंखला की तीन सफल फिल्मो के बाद उन पर सफलता को बरकरार रखने का दबाव आगया है . इसी लिए उन्होंने शाहरुख़ , करीना पर दांव लगाया है कि भले ही अंत में फिल्म का कुछ भी हो लेकिन इस स्टार -कास्ट से फिल्म कि लागत तो निकल ही जायेगी .


सफलता को दोहराना आसान नहीं है .कोई भी फिल्म पहले लेखक के दिलो दिमाग में बनतीहै फिर कागज़ पर उतर कर कैमरे से गुजरती है . क्या रोहित, गुलजार का पांच प्रतिशत भी दोहरा पायेंगे ? कभी नहीं . क्योंकि उनके पास संजीव कुमार और देवेन वर्मा नहीं होंगे न ही वह काल होगा ,न गुलजार की वह कसक होगी . होगी तो सिर्फ और सिर्फ एक रेडीमेड कहानी जिसे तात्कालीन समय के हिसाब से ढाल लिया जाएगा.और इंस्टेंट पित्ज़ा की तरह 2013 में परोस दिया जाएगा. न तो संजीव कुमार के चरित्र के साथ बादशाह खान न्याय कर पायेंगे न ही मोसमी की मासूमियत को करीना -जी पाएगी. कुल मिलाकर 'अंगूर' के नाम पर हमारे सामने जो होगा2011 का आत्माहीन मसाला होगा. -मजे की बात तो यह है की 1982 में इस फिल्म को आलोचकों ने दस में से 8 .2 अंक दिए थे. आज की तारीख में है कोई माई का लाल जो इस प्रदर्शन को दोहरा सके ?



लेख समाप्त करने से पहले एक खबर और देना जरुरी है .1975 में ऋषिकेश मुखर्जी निर्देशित '' चुपके -चुपके ''भी डेविड धवन के निशाने पर आचुकी है. अमिताभ, धर्मेन्द्र , शर्मीला टगोर , और जया बच्चन से सजी इस उम्दा कामेडी के रीमेक के लिए रूमी जाफरी नए सिरे से पटकथा लिख रहे है. मात्र दस लाख के बजट में बनी इस फिल्म के रीमेक का क्या हश्र होगा इस पर किसी और दिन चर्चा करेंगे.

बहरहाल, मील के पत्थर बिखरते देखेंगे ---हम लोग .

Thursday, January 20, 2011

प्रिंस चार्ल्स और डायना के बेटे की शादी


वर्ष 2011 ब्रिटेन के शाही परिवार के लिए एक यादगार साल रहेगा. अप्रैल में महारानी एलिज़ाबेथ का 85वाँ जन्मदिन, जून में उनके पति प्रिंस फ़िलिप की 90वीं सालगिरह और इस सब से बढ़ कर 29 अप्रैल को महारानी के पोते विलियम की केट मिडलटन से शादी.बकिंघम पैलेस के अधिकारी देश के आर्थिक हालात को जानते हुए इस बारे में काफ़ी चौकसी बरत रहे हैं.बडती बेरोजगारी, डटी हुई आर्थिक मंदी के चलते आम जन में सरकार के प्रति गुस्सा तो है परन्तु राज परिवार के लिए स्नेह भी है . अगर जनता को यह सन्देश जाता है कि उनके पसीने के टेक्स को राजा रानी की शादी में उड़ाया जा रहा है तो बात बिगड़ सकती है .

इस विवाह की विलियम के पिता चार्ल्स और माँ डायना के विवाह से तुलना की जाएगी

उनका कहना है कि विलियम का केट से विवाह शायद उनके माता-पिता की तरह का आलीशान आयोजन न हो कर उनकी दादी और दादा के विवाह का प्रतिरूप हो.

शादी में कौन मेहमान शामिल होंगे, इस बारे में अभी कोई ऐलान नहीं हुआ है.

विलियम और केट एक दूसरे को पिछले आठ वर्ष से जानते हैं. दोनों ने जब 16 नवंबर को अपनी सगाई की घोषणा की तो किसी को हैरत नहीं हुई.
बहरहाल, केट मिडलटन के शाही परिवार में शामिल होने को लेकर ब्रितानी उत्सुक भी हैं और प्रतीक्षा भी कर रहे हैं.

उनमें से कुछ को यह उम्मीद भी है कि नई दुलहन 2012 में, महारानी एलिज़ाबेथ के राज्याभिषेक के पचास वर्ष पूरे होने पर, उनकी गोद में एक पड़पोता दे सकें.

Monday, January 17, 2011

हर जगह चीन .


चीन ने विकासशील देशों को कर्ज देने के मामले में विश्व बैंक को पीछे छोड़ दिया है.

फ़ाइनेंशियल टाइम्स के अनुसार चीन के विकास बैंक और आयात-निर्यात बैंक ने पिछले दो वर्षों में 110 अरब डॉलर के ऋण विभिन्न सरकारों और निजी कंपनियों को वितरित किए.

ये विश्व बैंक के ऋण वादों से 10 फ़ीसदी ज्यादा है.

विश्व बैंक ने वित्तीय संकट के दौरान वर्ष 2008 से 2010 के बीच सौ अरब डॉलर के ऋण स्वीकृत किए हैं.विश्लेषकों का कहना है कि ये चीन की आर्थिक ताकत का प्रतीक है. साथ ही ये चीन के विकासशील देशों से बढ़ते संबंधों को भी दर्शाता है.

Sunday, January 2, 2011

पटरी से उतरता एक बादशाह .


नए साल के पहले रविवार टाइम्स ऑफ़ इंडिया के पहले पेज पर फुल पेज का विज्ञापन छपा . यह विज्ञापन था शाहरुख की आने वाली फिल्म रा -वन का. इस में शाहरुख अपनी चिर परिचित मुद्रा में थे . अकड़े हुए . सपाट चेहरा , भाव ऐसे कि '' में किसी कि परवाह नहीं करता '' . अकड़और अहंकार शाहरुख के चरित्र के अहम् हिस्सा बन गए है. हो सकता है रा-वन में उनका किरदार ही भावनाहीन मशीन का हो , परन्तु उनके पिछले सालो के स्वभाव पर नजर डाले तो उनकी छवि सहज सरल अभिनेता की कभी नहीं रही है.

नब्बे के दशक से शाहरुख़ ने सफलता का स्वाद चखना शुरू किया. उनकी फिल्मे बॉक्स ऑफिस पर धन बरसाने लगी .भारत ही नहीं वरन ओवेर्सिस में भी उनकी फिल्मो ने कमाल का व्यवसाय करना शुरू किया . हिंदी सिनेमा में वे पहले सितारे बने जिसकी फिल्मे विदेशो में सबसे ज्यादा कमाई करने लगी , बस यही पर मीडिया ने उन्हें ' बादशाह खान ' से नवाज दिया और इस लेबल ने शाहरुख खान का दिमाग सातवे आसमान पर पहुचा दिया. बडबोला पण उन पर हावी होने लगा और उन्होंने अपने समकालीन अभिनेताओं और सीनियर पर टिपण्णी कर आहत करना शुरू किया. नए साल के मोके पर ब्रिटेन के एक अखबार ने दस घमंडी खिलाडियों की सूची जारी की है. जिसमे हमारे यूवराज सिंह भी शामिल है. ऐसी ही कोई सूची फिल्म अभिनेताओं की बनेगी तो निश्चित तौर पर उसमे शाहरुख पहले पांच में शामिल होंगे.

समकालीन खान अभिनेताओं से उनका पंगा जग जाहिर है . सलमान और आमिर उनके निशाने पर हमेशा से रहे है. मनोविज्ञान का सिद्धांत है कि असुरक्षा की भावना मनुष्य को आक्रमण करने को प्रेरित करती है. परन्तु आज शाहरुख़ इस मुकाम पर आगये है जहां असफलता से डर कोई मायने नहीं रखाता है .शाहरुख बड़े सितारे है परन्तु आदरणीय नहीं है.इस बात को उनके हालिया बयान ने और ज्यादा मजबूत किया है. मौका था करण जोहर के साथ काफी पीने का. यहाँ भी उन्होंने अपने अहंकार का डटकर प्रदर्शन किया और दोनों खान सितारों से दोस्ती के रास्ते बंद कर दिए.
बादशाह के आवरण में लिपटे शाहरुख को यह मानना हित में होगा कि सफलता के संकरे शिखर पर हमेशा नहीं रहा जासकता है..आज नहीं तो कल उन्हें ढलान पर आना ही होगा. और उस समय अहंकारहीन शाहरुख को ही तव्वज्जो मिलेगी जैसी एक जमाने के क्रोधित यूवक अमिताभ को आज अपनी विनम्रता के लिए सर आँखों पर बिठाया हुआ है