

हो सकता है इस घोषणा से कुछ लोग खुश हो सकते है . परन्तु नाराज होने वालो की तादात बड़ी होगी . एक दिन के अंतराल से खबर आई की फिल्म 'अंगूर' (गुलजार द्वारा लिखित व निर्देशित ) कालजयी रचना को पुन्ह बनाया जाएगा . इस बार नायक होंगे शाहरुख़ खान , तुषार कपूर व नायिका होंगी करीना. याद कीजिये 'अंगूर' और जेहन में तेर जाती है संजीव कुमार और देवेन वर्मा की मासूम जोड़ी.यही नहीं मौसमी चटर्जी , अरुणा ईरानी और दीप्ती नवल का बिंदास अभिनय . गुलजार का कसा हुआ स्क्रीन प्ले ,आर .डी. बर्मन के संगीत से सजी इस फिल्म को आसानी ने नहीं भुलाया जा सकता है. किसी भी कालजयी और ऐतिहासक फिल्म को दस बीस बरस के बाद फिर से बनाना दो बातो की और इशारा करता है . एक - मौजूदा फिल्मकारों के पास नए विषय नहीं है या वे नए विषय को लेकर रिस्क नहीं लेना चाहते है , दूसरा -शोर्ट कट से सफल होने की प्रवृति , गुजरे जमाने की सुपर हिट, या जन मानस में बसी फिल्म का रिमेक पहले दिन से ही जनचर्चा का विषय बन जाता है और फिल्म प्रेमियों में इस बात की उत्सुकता जगा देता है की वे पुरानी फिल्म की तुलना नयी फिल्म से करने लगते है . बस यही पर नए फिल्म कार को बेठे ठाले मुफ्त में प्रचार मिल जाता है . .
'अंगूर ' को इस बार रोहित शेट्टी डायरेक्ट करने वाले है. 'गोलमाल ' श्रंखला की तीन सफल फिल्मो के बाद उन पर सफलता को बरकरार रखने का दबाव आगया है . इसी लिए उन्होंने शाहरुख़ , करीना पर दांव लगाया है कि भले ही अंत में फिल्म का कुछ भी हो लेकिन इस स्टार -कास्ट से फिल्म कि लागत तो निकल ही जायेगी .
सफलता को दोहराना आसान नहीं है .कोई भी फिल्म पहले लेखक के दिलो दिमाग में बनतीहै फिर कागज़ पर उतर कर कैमरे से गुजरती है . क्या रोहित, गुलजार का पांच प्रतिशत भी दोहरा पायेंगे ? कभी नहीं . क्योंकि उनके पास संजीव कुमार और देवेन वर्मा नहीं होंगे न ही वह काल होगा ,न गुलजार की वह कसक होगी . होगी तो सिर्फ और सिर्फ एक रेडीमेड कहानी जिसे तात्कालीन समय के हिसाब से ढाल लिया जाएगा.और इंस्टेंट पित्ज़ा की तरह 2013 में परोस दिया जाएगा. न तो संजीव कुमार के चरित्र के साथ बादशाह खान न्याय कर पायेंगे न ही मोसमी की मासूमियत को करीना -जी पाएगी. कुल मिलाकर 'अंगूर' के नाम पर हमारे सामने जो होगा2011 का आत्माहीन मसाला होगा. -मजे की बात तो यह है की 1982 में इस फिल्म को आलोचकों ने दस में से 8 .2 अंक दिए थे. आज की तारीख में है कोई माई का लाल जो इस प्रदर्शन को दोहरा सके ?
लेख समाप्त करने से पहले एक खबर और देना जरुरी है .1975 में ऋषिकेश मुखर्जी निर्देशित '' चुपके -चुपके ''भी डेविड धवन के निशाने पर आचुकी है. अमिताभ, धर्मेन्द्र , शर्मीला टगोर , और जया बच्चन से सजी इस उम्दा कामेडी के रीमेक के लिए रूमी जाफरी नए सिरे से पटकथा लिख रहे है. मात्र दस लाख के बजट में बनी इस फिल्म के रीमेक का क्या हश्र होगा इस पर किसी और दिन चर्चा करेंगे.
बहरहाल, मील के पत्थर बिखरते देखेंगे ---हम लोग .


