अरुणा जिस अस्पताल में पिछले 37 साल से बिस्तर पर हैं वहाँ के डॉक्टरों और नर्सों ने इस फ़ैसले का यह कहते हुए स्वागत किया कि वे आजीवन अरुणा की देखभाल करने के लिए तैयार हैं.
अरुणा इस पर कोई प्रतिक्रिया ज़ाहिर करने की स्थिति में नहीं हैं. यानी उन्हें ज़िंदा रखने या न रखने की बहस में उनका कोई योगदान नहीं है..
अब अरुणा के दिल की हालत कौन समझे. कहते हैं हरेक को जान प्यारी होती है और कोई भी मरना नहीं चाहता.
तो साथ ही यह भी सुना है कि हे ईश्वर, ऐसी ज़िंदगी से तो मौत भली.
अरुणा किस मनोदशा से गुज़र रही हैं यह वह ही जानती हैं.
एक तरह से इच्छा मृत्यु के विरोधियों का तर्क सही है कि अगर एक बार इसकी अनुमति दे दी गई तो ऐसे मामलों का अंबार लग जाएगा और यह तय करना मुश्किल हो जाएगा कि किसमें पीड़ित व्यक्ति की सहमति है और किसमें उसके तीमारदारों का फ़ायदा.
लेकिन इसके साथ ही इस बात को भी झुठलाया नहीं जा सकता कि टर्मिनल इलनेस यानी लाइलाज बीमारी से जूझ रहे और असहनीय पीड़ा भुगत रहे रोगी को कृत्रिम मशीनों के ज़रिए जीवित रखना कितना मानवीय है.
यह एक ऐसा मामला है जिस पर लोग बोलने से कतराते हैं.
ज़रूरत है एक राष्ट्रव्यापी बहस की जिसमें सबको अपनी राय रखने का मौक़ा मिले.
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