Wednesday, March 23, 2011

बिल गेट्स बिहार के दौरे पर .....

दुनिया के दूसरे सबसे अमीर कारोबारी और माइक्रोसॉफ्ट के संस्थापक बिल गेट्स और उनकी पत्नी मेलिंडा गेट्स तीन दिन के भारत दौरे पर हैं.

भारत दौरे के पहले दिन गेट्स दम्पती ने स्वास्थ्य मंत्री ग़ुलाम नबी आज़ाद से मुलाक़ात की और देश में स्वास्थय सेवाओं को बेहतर बनाने और पोलियो तथा एड्स के उन्मूलन पर चर्चा की.

इस यात्रा के दौरान बिल और मेलिंडा गेट्स का ध्यान बिहार पर केंद्रित होगा. गेट्स दम्पती बुधवार पटना जिले के जमसौत गांव का दौरा कर वहां की स्वास्थ्य सेवाओं का जायज़ा ले रहे हैं.

बिहार का स्वास्थ्य क्षेत्र भारत के और राज्यों के मुक़ाबले बेहद कमज़ोर माना जाता है.

बिहार का हाल

मेलिंडा गेट्स ने दिल्ली में हुए एक सम्मेलन में नवजात शिशुओं और माताओं के स्वास्थ्य सुधार पर ज़ोर दिया.

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार भारत में 55 प्रतिशत बच्चे कुपोषण का शिकार होते हैं, और ये आंकड़ा बिहार में भी लगभग इतना ही है. इसके अलावा काला अज़ार, खसरा और टीबी जैसी बीमारियां बिहार में चरम पर हैं.

साल 2010 में बिल गेट्स ने बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के साथ एक क़रार किया था, जिसके तहत राज्य में पोलियो, काला अज़ार, टीबी और कुपोषण जैसी बीमारियों से लड़ने के लिए गेट्स की परोपकारी संस्था ने 8 करोड़ डॉलर की राशि प्रदान की थी.

इस भागीदारी का उद्देश्य अगले पांच वर्षों में बच्चों और माताओं के मृत्यु दर में 40 प्रतिशत तक की गिरावट लाना होगा.

अपने एक दिन के बिहार दौरे के दौरान बिल और मेलिंडा गेट्स जमसौत में स्वास्थय कर्मियों और कुछ गर्भवती महिलाओं से उनके अनुभव और चुनौतियों के बारे में बातचीत करेंगें.

बिहार में मातृत्व मृत्यु दर देश में सबसे ज़्यादा है.

बिहार यात्रा के दौरान बिल गेट्स राज्य सरकार के साथ हुई 8 करोड़ डॉलर की भागीदारी की प्रगति का जायज़ा भी लेंगें.

परोपकारी संस्था बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन की सह-संस्थापक मेलिंडा गेट्स ने मंगलवार को दिल्ली में एक सम्मेलन को संबोधित करते हुए नवजात शिशुओं और माताओं के स्वास्थ्य सुधार पर ज़ोर दिया.

मेलिंडा का कहना था कि बेहतर तकनीक के इस्तेमाल और उसके सस्तीकरण से भारत में माताओं और नवजात शिशुओं का जीवन बचाया जा सकता है.

दशक टीकाकरण

बिल गेट्स ने इस दशक को ‘टीकाकरण के दशक’ का नाम दिया है

बिल गेट्स ने इस दशक को ‘टीकाकरण के दशक’ का नाम दिया है जिसके ज़रिए विश्व भर में खसरा, पोलियो और हैजा जैसी बीमारियों से लड़ने के लिए बच्चों को टीके लगाए जाएंगें.

साथ ही इस साल बिल गेट्स का ध्यान पोलियो को जड़ से ख़त्म करना होगा.

भारत सरकार ने पोलियो उन्मूलन मुहिम में पिछले दो सालों में अच्छी प्रगति दर्ज की है. जहां 2009 में भारत में 714 पोलियो के केस थे, वहीं 2010 में पाया गया कि भारत में केवल 41 पोलियो के केस बचे हैं.

ग़ौरतलब है कि बिहार में पिछले छह महीनों में एक भी पोलियो का केस सामने नहीं आया है. हांलाकि काला अज़ार, टीबी, खसरा और मलेरिया के आंकड़ों में ऐसी प्रगति देखने को नहीं मिली है.

पोलियो उन्मूलन मुहिम

पोलियो उन्मूलन के लिए गेट्स फाउंडेशन, रोटरी इंटरनैश्नल और विश्व स्वास्थ्य संगठन जैसी संस्थाएं मिलकर एक मुहिम चला रही हैं.

विश्व भर में पोलियो के कुछ 1300 के क़रीब केस हैं, और ये केस केवल भारत, पाकिस्तान, अफ्ग़ानिस्तान और नाइजीरिया में पाए गए हैं.

विश्व भर में पोलियो का 99 प्रतिशत खात्मा हो चुका है और आख़िरी 1 प्रतिशत को जड़ से मिटाने के लिए गेट्स फाउंडेशन, रोटरी इंटरनैश्नल और विश्व स्वास्थ्य संगठन जैसी संस्थाएं मिलकर एक मुहिम चला रही हैं.

अगर पोलियो को अगले कुछ सालों में जड़ से ख़त्म कर देने में कामयाबी हासिल होती है, तो चेचक के बाद ये दूसरी बीमारी होगी जो विश्व भर से हमेशा के लिए मिट जाएगी.

विश्व टीबी दिवस यानि 24 मार्च को बिल गेट्स दिल्ली के लाला रामस्वरुप टीबी अस्पताल का दौरा करेगें, जिसके बाद वे विज्ञान और तकनीक मंत्री कपिल सिब्बल से मुलाक़ात करेंगें.

इस बैठक में बिल गेट्स टीबी के लक्षणों का जल्द पता लगाने के लिए नई तकनीक के इस्तेमाल पर चर्चा करेंगें.

भारत में हर साल क़रीब 20 लाख टीबी के केस सामने आते हैं, और आंकड़ों के अनुसार हर तीन मिनट में दो भारतीय मरीज़ टीबी की मौत का शिकार होते हैं.

गेट्स फाउंडेशन भारत में स्वास्थ्य क्षेत्र के सुधार के लिए अब तक एक अरब डॉलर की राशि दे चुका है.


साइट लिंकबीबीसी लिंक
© MMXI

Tuesday, March 8, 2011

ईच्छा मृत्यु !!

अरुणा शानबाग मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने लेखिका पिंकी वीरानी की यह अर्ज़ी नामंज़ूर कर दी कि अरुणा की हालत को देखते हुए उनकी मौत की अनुमति दी जाए.

अरुणा जिस अस्पताल में पिछले 37 साल से बिस्तर पर हैं वहाँ के डॉक्टरों और नर्सों ने इस फ़ैसले का यह कहते हुए स्वागत किया कि वे आजीवन अरुणा की देखभाल करने के लिए तैयार हैं.

अरुणा इस पर कोई प्रतिक्रिया ज़ाहिर करने की स्थिति में नहीं हैं. यानी उन्हें ज़िंदा रखने या न रखने की बहस में उनका कोई योगदान नहीं है..

अब अरुणा के दिल की हालत कौन समझे. कहते हैं हरेक को जान प्यारी होती है और कोई भी मरना नहीं चाहता.

तो साथ ही यह भी सुना है कि हे ईश्वर, ऐसी ज़िंदगी से तो मौत भली.

अरुणा किस मनोदशा से गुज़र रही हैं यह वह ही जानती हैं.

एक तरह से इच्छा मृत्यु के विरोधियों का तर्क सही है कि अगर एक बार इसकी अनुमति दे दी गई तो ऐसे मामलों का अंबार लग जाएगा और यह तय करना मुश्किल हो जाएगा कि किसमें पीड़ित व्यक्ति की सहमति है और किसमें उसके तीमारदारों का फ़ायदा.

लेकिन इसके साथ ही इस बात को भी झुठलाया नहीं जा सकता कि टर्मिनल इलनेस यानी लाइलाज बीमारी से जूझ रहे और असहनीय पीड़ा भुगत रहे रोगी को कृत्रिम मशीनों के ज़रिए जीवित रखना कितना मानवीय है.

यह एक ऐसा मामला है जिस पर लोग बोलने से कतराते हैं.

ज़रूरत है एक राष्ट्रव्यापी बहस की जिसमें सबको अपनी राय रखने का मौक़ा मिले.

Wednesday, March 2, 2011

नोबेल ?

नोबेल प्राइज मिल जाने का यह मतलब नहीं है की जिस शख्स को यह पुरूस्कार मिला है वह 'मन ' और ईमान से भी नोबेल है . बंगला देश के मोहमद युनुस जिन्हें २००६ में मैक्रो -इकोनोमिक्स में उनके प्रयोगों(ग्रामीण बेंक) के लिए इस पुरूस्कार से नवाजा गया था . अब खबर आई है कि उन्हें बेंक के प्रबंध निदेशक के पद से हटा दिया गया है .कारण महज इतना है कि उन पर करोडो रुपयों कि हेराफेरी का आरोप लगा है .

बांग्लादेश के कंद्रीय बैंक ने कहा है कि 70 वर्षीय मुहम्मद युनूस को इसलिए हटाया गया क्योंकि वे 60 साल की उम्र के बाद भी ग्रामीण बैंक के प्रबंध निदेशक बने रहे.मुहम्मद यूनुस बांग्लादेश सरकार के आलोचक रहे हैं. सरकार की अब ग्रामीण बैंक में 25 फ़ीसदी हिस्सेदारी है.

Monday, February 28, 2011

अंतिम कर्नल !!



अगर 7 जून 2011 तक गदाफी सत्ता में बने रहे तो वे 69 वसंत देख चुके होंगे .1969 में किंग इदरिस को हटा कर सत्ता काबिज करने की 41 वी वर्षगाँठ भी मना लेंगे.यह उपलब्धि उन्हें इतिहास में सबसे ज्यादा समय तक शासन करने वाले व्यक्ति के रूप स्थापित कर देगी . भले ही दुनिया उन्हें सनकी तानाशाह के नाम से पुकारे. प्रस्तुत हे उनके और उनके परिवार के बारे में कुछ जानकारी -
गद्दाफी को उंचाई से डर लगता है .पेंतीस सीडियो से ज्यादा वे चढ़ नहीं सकते .
अपनी दो (वेध ) पत्नियों से उनके आठ बच्चे है. सबसे बड़े पुत्र लीबियाई ओलिम्पिक कमिटी के चेयर मेन है. साथ ही देश की सबसे बड़ी शीतल पेय कंपनी में चालीस फीसदी की हिस्सेदारी रखते है. समय समय पर देश के टेलीग्राफ और दूरसंचार के मामले में भी उनका दबदबा चलता रहता है .अमरीका की मशहूर गायिकाओ , मरिया केरी और बेयोसी के कार्यक्रम अपने देश में कराकर लाखों डॉलर फूंक चके है.
एक बेटी ने कानून की पदाई की है और काफी समय तक सद्दाम हुसैन की सुरक्षा सलाहकार रह चुकी है . फिलहाल सेना में लेफ्टिनेंट के पद पर है. जर्मन अभिनेत्री क्लाडिया शिफर से उनकी शक्ल मिलती जुलती. यूरोप में उनकी खुद की काफी जान पहचान हे. लिहाजा अपने पिता को विदेशी मामलो में मशवरा देती रहती है . अपने पिता की लाडली संतान है .
गद्दाफी की सुरक्षा का जिम्मा चालीस यूवा महिलाओ का दस्ता सम्हालता है . सभी की उम्र पच्चीस से तीस के बीच है. इनका चुनाव बाकायदा दो साल के कड़े कालेज प्रशिक्षण के बाद किया जाता है. अधिकाँश महिलाए यूक्रेन , ब्रिटेन , और जर्मनी की है. इन्हें मरने-मारने
की शपथ दिला कर ही सुरक्षा की जवाबदारी सोंपी जाती है .
गद्दाफी को समुद्र से भी डर लगता है. उनकी अधिकाँश हवाई यात्राए जमीन के ऊपर वाले इलाके से हो कर ही गुजरती है. अगर समुद्र के ऊपर से गुजरना भी पड़े तो ऐसा रूट तय किया जाता है जब आठ घंटे से ज्यादा हवाई जहाज को समुद्र के ऊपर न रहना पड़े .
गद्दाफी की निजी सहायिका युक्रेन निवासी' गलीना कोलोत्निसका ' जिसके बारे में विकिलीक्स ने अपने केबल में लिखा था- गद्दाफी भूरे बालों वाली लड़की से प्रेम करते है, हाल ही में ब्रिटिश एयरवेज के विमान से स्वदेश लोटती देखी गई थी .
उडती उडती खबर - गद्दाफी ने इंग्लॅण्ड के एक बेंक में 21878 करोड़ डॉलर जमा कराये है और सोने के बिस्किट से लदा एक विमान जिम्बाब्वे भेजा है . वंहा के तानाशाह शासक रॉबर्ट मुगाबे गद्दाफी के परम मित्र है . एक दफे इन दोनों ने सारे अफ़्रीकी देशों को मिलाकर 'एक अफ़्रीकी 'राष्ट्र बनाने का सपना देखा था . जिसमे मुगाबे को प्रधानमंत्री बनना था और गद्दाफी को राष्ट्रपति .

Thursday, February 24, 2011

क्या हमारी तरफ ध्यान देंगे मि. टेड टर्नर ?


मुझे आश्चर्य है कि टेड टर्नर को भारत में अपनी -सिर्फ क्लासिक 'ब्लेक एंड व्हाइट फिल्म दिखने वाली चेनल TNT के भारतीय संस्करण को लांच करने का ख्याल अभी तक क्यों नहीं आया ? टेड टर्नर 'टाइम वार्नर इंक' CNN न्यूज चेनल, और 'वार्नर ब्रदर ' के भी मालिक है. यूँ तो TNT पिछले पंद्रह सालो से भारत में(अमेरिकन क्लासिक)फिल्मे प्रसारित कर रहा है, परन्तु जिस तरह से उन्होंने TNT के 'स्पेनिश ' और 'तुर्की' संस्करण जारी किये है और कई यूरोपीयन संस्करणों पर काम जारी है वेसी ही गुंजाइश भारत में भी है .
भारत में प्रति वर्ष एक हजार से ज्यादा फिल्मे बनती है और पहली बोलती फिल्म आलम -आरा से लेकर 'ब्लेक एंड व्हाइट फिल्मो के पुरे दौर में बेहतरीन क्लासिक और यादगार फिल्मे बनी है.परन्तु उचित रख रखाव के आभाव में अधिकाँश फिल्मो के प्रिंट नष्ट होने का कगार पर है. फिल्मो के प्रिंट की अधिकतम उम्र 70 -80 बरस होती है, गर उन्हें दो डिग्री सेल्सियस और चोवीस डिग्री आन्द्रता में संरक्षित किया जाए तब .
दूसरी तरफ पुराने संगीत को संरक्षित करने में ज्यादा प्रयास नहीं करना पड़े है. यह काम कम खर्च में बगेर कोई आन्दोलन किये संपन्न हो रहा है. इसे सहेजने में राष्ट्रीय रेडियो स्टेशन के अलावा निजी स्टूडियो ने भी विशेष रूचि दिखाई और समय समय पर ओल्ड -इस -गोल्ड नाम से संगीत जारी कर काफी धन कमाया है .
इस तथ्य से इनकार नहीं है कि पुरानी और क्लासिक फिल्मो के प्रिंट को डिजिटल करने का काम काफी खर्चीला है , परन्तु टेड टर्नर जेसे मीडिया सम्राट के लिए यह काम आसान है.उन्होंने अमेरिका में 1939 से लेकर ब्लेक एंड व्हाईट दौर कि अधिकाँश फिल्मो को सहेज कर अपने टेलीविजन पर प्रसारित किया है और कुछ फिल्मो को रंगीन करने की आलोचना भी झेली है.
हमारे देश के प्रमुख औद्योगिक घरानों ने भी पिछले कुछ समय से फिल्मो को व्यापार के रूप में लेना शुरू किया है . अनिल अम्बानी ग्रुप , सन टीवी , आदि विशेष रूप से सक्रिय है , परन्तु इनका भी रुझान फिल्म निर्माण और फिल्मो के लिए वित्त उपलब्ध करने तक ही है .कुछ लोग अवश्य टेलीविजन चेनल शुरू कर चुके है परन्तु वे मनोरंजक चेनल और न्यूज चेनल पर ही अटके हुए है
भारत के फिल्म प्रेमी दुआ ही कर सकते है कि टेड टर्नर का ध्यान इस तरफ जाए ..या हमारे अनिल अम्बानी , सुभास चन्द्रा या दयानिधि मारन को कुछ नया करने का जूनून आये .
(टेड टर्नर की मशहूर अभिनेत्री पत्नी जेन फोंडा ने अस्सी के दशक में योग के माध्यम से अपना 'काया-कल्प ' किया था. अपना फिटनेस विडियो जारी करने वाली वे पहली स्टार थी. भारत में उनका अनुसरण कर निख़रने वाली सर्वप्रथम अभिनेत्री रेखा थी )

Monday, February 21, 2011

ओस्कर !!


ओस्कर समारोह महज एक हफ्ते दूर है. 27 फरवरी को लोस एंजल के कोडक थियेटर में होलीवूड के नाम चीन फिल्मकार रेड कारपेट पर अवतरित होंगे. यधपि ओस्कर सिर्फ अमरीकन फिल्मो को ही सम्मानित करने के लिए दिया जाता है , परन्तु सारी दुनिया टकटकी लगा कर इन पुरुस्कारों की घोषणा को अपने टेलीविजन सेट के जरिये देखती है. इस वर्ष होने वाला समारोह 83 वां होगा . चूँकि फिल्म निर्माण के हर वर्ग के लिए केटेगरी बनी हुई है , परन्तु फिर भी सबसे ज्यादा उत्सुकता 'बेस्ट फीचर फिल्म ' बेस्ट एक्टर' बेस्ट एक्ट्रेस ' को ही लेकर होती है .

ओस्कर के साथ सबसे अच्छी बात यह रही है कि इसकी विश्वश्नियता बरसो से बरकरार है. पक्षपात के आरोप न के बराबर लगे है . उसकी वजह है 5578 ओस्कर सदस्यों का निर्णायक मंडल. यह निर्णायक वोटिंग के जरिये अपनी राय ओस्कर अकादमी को बंद लिफाफों में समारोह से मात्र पांच दिन पूर्व भेजते है .

दुनिया भर कि फिल्मो को प्रोत्साहित करने के लिए 'फोरेन लंगुएज फिल्म ' की एक कटेगरी अलग से बनाई गई है. इसमें हर वर्ष मात्र चार फिल्मो को अंतिम दौर के लिए चयनित किया जाता है . विदित हो, 'लगान' अंतिम चार में जगह बनाने के बाद भी ' नो मेंस लैंड' से शिकस्त खा गई थी.


इस वर्ष अच्छी फिल्मो की दौड़ में प्रमुख है ' द किंग्स स्पीच ' सोसल नेटवर्क ' ( फेसबुक के जनक मार्क जुकेर्बेर्ग के जीवन पर आधारित ) 'इंसेप्शन ' और 'ब्लेक स्वान'. 'ब्लेक स्वान'.रूस के बेलेट डांस पर आधारित फिल्म है. उलेखनीय है कि इस फिल्म के ओस्कर जीतने की सबसे ज्यादा प्राथना रूस में हो रही. जबकि एक ज़माने रूस- अमेरिका कट्टर दुश्मन रहे है .डेनी बोयेल जिन्होंने दो बरस पहले 'स्लम डोग मिलेनियर ' के जरिये धूम मचाई थी , इस बार हेरत अंगेज फिल्म '127 अवर 'लेकर हाजिर है . इस फिल्म को भी पांच श्रेणियों में नामांकित किया गया है.


3 किलो 850 ग्राम वजनी एवं 13 .5 इंच लम्बी सोने की इस प्रतिमा का जादू कुछ ऐसा है कि दुनिया के सारे फ़िल्मी पुरूस्कार इसके सामने फीके लगते है. जिसके भी हाथ में यह जाती है उसका फ़िल्मी करियर और जिन्दगी दोनों ही सुनहरे रास्ते पर चल पड़ती है .शायद इसीलिए इसे पुरुस्कारों का पितामह कहा जाता है .




Monday, February 14, 2011

एक लड़की भीगी भागी सी..





14 फरवरी : वेलेन्ताईन डे : आज ख़ास तौर पर ऐसी अभिनेत्री को याद किया जाना चाहिए जिसके फोटो देखकर ही खालिस प्रेम की अनुभूति होती है. वह थी निर्मल सोंदर्य की देवी मधुबाला.' मुमताज जहां बेगम ' के नाम से जन्मी यह अभिनेत्री अपने ग्यारह भाई - बहनों में पांचवे स्थान पर थी. नाटको में इसका काम देखकर देविका रानी ने नाम दिया 'मधुबाला '. शायद नाम का ही कमाल था कि जीवन का पहला ब्रेक राज कपूर के साथ 'नील कमल ' में मिला उस समय उम्र थी चौदह बरस. सोलह बरस की उम्र में नायक बने अशोक कुमार फिल्म थी 'महल '. इस फिल्म से दो सितारों का जन्म हुआ. पहली तो यक़ीनन मधुबाला थी और दूसरी थी लता मंगेशकर. लता मंगेशकर के केरियर में यह फिल्म मील का पत्थर मानी जाती है .


सोंदर्य की इस मलिका का पहला प्रेम असफल रहा था. 1950 में फिल्म 'नया दौर' के निर्माण के समय एक विवाद ने वक्त की धाराए बदल दी थी. निर्माता बी . आर . चोपड़ा चाहते थे फिल्म की आउट डौर शूटिंग भोपाल में हो. फिल्म के नायक दिलीप कुमार थे नायिका मधुबाला. दोनों एक दुसरे के प्रेम में आकंठ डूबे हुए थे. लेकिन मधुबाला के अब्बा को लगता था की दिलीप कुमार के प्रभाव के कारण निर्माता जानबूझ कर फिल्म को बम्बई से बाहर शूट कर रहे है ताकि 'अकेलेपन का फायदा उठाकर मधुबाला को प्रेम जाल में फंसाया जा सके. इस गलत फहमी के चलते मधुबाला को फिल्म भी छोडनी पड़ी थी और परिवार के दबाव में आकर दिलीप कुमार को भी.......


यह भी संयोग ही था कि उस समय होलीवूड की 'मर्लिन मुनरो' मधुबाला की समकालीन थी. 'मर्लिन मुनरो' सारे जमाने को अपने सोंदर्य से चकाचोंध कर चुकी थी . तत्कालीन राष्ट्रपति जोन.ऍफ़ . केनेडी से असफल प्रेम के बाद 'मर्लिन को जीवन के नकली पन और नेराश्य के चलते आत्म हत्या करना पड़ी थी .



परन्तु नीयति ने मधुबाला के लिए कुछ और ही सोंच रखा था. दिल टूटने के साल भर अचानक पता चला था कि सुन्दरता कि इस मूर्ति के दिल में एक छेद है. उस समय यह एक ला-इलाज मर्ज था.

उम्र के 26 वे साल में मधुबाला को इस जान लेवा बिमारी ने घेरा था और अगले दस साल तक वह मौत को धकेलती रही थी. अपने 36 वे जन्म दिन के ठीक नौ दिन बाद मधुबाला दिल की बिमारी से हार गयी .

एक और विडम्बना - सन 2008 में भारत सरकार ने मधुबाला की याद में डाक टिकिट जारी किया था. परन्तु बांद्रा के जिस कब्रिस्तान में मधुबाला को 1969 में संगमरमर की कब्र में दफनाया गया था उसे 2010 में पुनर्निर्माण के कारण वंहा से हटा दिया गया.आज दावे के साथ कोई नहीं कह सकता की मधुबाला किस जगह दफ़न है.


Thursday, February 10, 2011

वो रहने वाली ब्रिटेन की


पश्चिम में जीवित लोकप्रिय और प्रसिद्ध व्यक्तियों के जीवन पर फिल्म बनाने की सफल परंपरा रही है. इसी कड़ी में ब्रिटेन की पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती मारग्रेट थेचर के प्रधानमंत्री कार्यकाल के दौरान हुए(1982 ) फाकलैंड युद्ध के सत्रह दिन को आधार बनाकर "द आयरन लेडी " फिल्म पर काम शुरू हो गया है. मार्गरेट की भूमिका मशहूर अमरीकी अभिनेत्री मेरिल स्ट्रीप निभा रही है . मेरिल स्ट्रीप 1978 से लेकर 2009 तक कई अकादमी (ओस्कर )पुरूस्कार जीत चुकी है. मेरिल ने मार्गरेट के किरदार में उतरने के लिए ब्रिटेन की संसद में बैठकर प्रधानमत्री के काम करने के ढंग को समझना आरम्भ कर दिया है.


हमारे देश में फिल्मकार अभी इस तरह के गंभीर और विवादस्पद विषयों से बचते रहे है . ऐसा नहीं है कि रोचक कहानिया नहीं है. हमारी पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी का पूरा जीवन उतार चडाव भरा रहा है ., जो किसी भी फिल्म के रोमांचक कथानक के लिए सबसे जरुरी है. ठीक उसी तरह सोनिया गांधी का केम्ब्रिज से लेकर दस जनपथ का सफ़र कई 'सिक्वेल ' बनाने लायक मसाला उपलब्ध करा सकता है . अमरीका में बसे फिल्मकार 'जगमोहन मुंदरा,' ने इतालवी अभिनेत्री मोनिका बलूची को लेकर एक फिल्म सोनिया गांधी पर शुरू करने कि घोषणा की थी ...फिल्म कब शुरू होगी किसी को पता नहीं है. विदित हो कि जगमोहन मुंदरा कि छवि कामसूत्रीय फिल्म ' डिवाइन लवर्स ' जेसी फिल्मो के निर्माता की रही है.

भारत में सेंसर बोर्ड के समानांतर भी एक सेंसर बोर्ड काम करता है . कभी यह भगवा की शक्ल में सामने आता है , कभी खादी में और और कभी शिव सेना के रूप में. यही कारण है की स्वतंत्र फिल्मकार चाह कर भी इस दिशा में सोंच नहीं पाता है .

बहरहाल,एक समय किवदंती रही मार्गरेट थेचर को रुपहले परदे पर देखना इतिहास की सुहानी यात्रा जेसा रहेगा. यह बात और कि एक समय कि लोह महिला आज स्मरण शक्ति लगभग खो चुकी है, और अपनी बेटी कि देखरेख में गुमनाम जिन्दगी जी रही है .

Tuesday, January 25, 2011

बरगद के बोनसाई मत बनाओ यार !!



हो सकता है इस घोषणा से कुछ लोग खुश हो सकते है . परन्तु नाराज होने वालो की तादात बड़ी होगी . एक दिन के अंतराल से खबर आई की फिल्म 'अंगूर' (गुलजार द्वारा लिखित व निर्देशित ) कालजयी रचना को पुन्ह बनाया जाएगा . इस बार नायक होंगे शाहरुख़ खान , तुषार कपूर व नायिका होंगी करीना. याद कीजिये 'अंगूर' और जेहन में तेर जाती है संजीव कुमार और देवेन वर्मा की मासूम जोड़ी.यही नहीं मौसमी चटर्जी , अरुणा ईरानी और दीप्ती नवल का बिंदास अभिनय . गुलजार का कसा हुआ स्क्रीन प्ले ,आर .डी. बर्मन के संगीत से सजी इस फिल्म को आसानी ने नहीं भुलाया जा सकता है. किसी भी कालजयी और ऐतिहासक फिल्म को दस बीस बरस के बाद फिर से बनाना दो बातो की और इशारा करता है . एक - मौजूदा फिल्मकारों के पास नए विषय नहीं है या वे नए विषय को लेकर रिस्क नहीं लेना चाहते है , दूसरा -शोर्ट कट से सफल होने की प्रवृति , गुजरे जमाने की सुपर हिट, या जन मानस में बसी फिल्म का रिमेक पहले दिन से ही जनचर्चा का विषय बन जाता है और फिल्म प्रेमियों में इस बात की उत्सुकता जगा देता है की वे पुरानी फिल्म की तुलना नयी फिल्म से करने लगते है . बस यही पर नए फिल्म कार को बेठे ठाले मुफ्त में प्रचार मिल जाता है . .

'अंगूर ' को इस बार रोहित शेट्टी डायरेक्ट करने वाले है. 'गोलमाल ' श्रंखला की तीन सफल फिल्मो के बाद उन पर सफलता को बरकरार रखने का दबाव आगया है . इसी लिए उन्होंने शाहरुख़ , करीना पर दांव लगाया है कि भले ही अंत में फिल्म का कुछ भी हो लेकिन इस स्टार -कास्ट से फिल्म कि लागत तो निकल ही जायेगी .


सफलता को दोहराना आसान नहीं है .कोई भी फिल्म पहले लेखक के दिलो दिमाग में बनतीहै फिर कागज़ पर उतर कर कैमरे से गुजरती है . क्या रोहित, गुलजार का पांच प्रतिशत भी दोहरा पायेंगे ? कभी नहीं . क्योंकि उनके पास संजीव कुमार और देवेन वर्मा नहीं होंगे न ही वह काल होगा ,न गुलजार की वह कसक होगी . होगी तो सिर्फ और सिर्फ एक रेडीमेड कहानी जिसे तात्कालीन समय के हिसाब से ढाल लिया जाएगा.और इंस्टेंट पित्ज़ा की तरह 2013 में परोस दिया जाएगा. न तो संजीव कुमार के चरित्र के साथ बादशाह खान न्याय कर पायेंगे न ही मोसमी की मासूमियत को करीना -जी पाएगी. कुल मिलाकर 'अंगूर' के नाम पर हमारे सामने जो होगा2011 का आत्माहीन मसाला होगा. -मजे की बात तो यह है की 1982 में इस फिल्म को आलोचकों ने दस में से 8 .2 अंक दिए थे. आज की तारीख में है कोई माई का लाल जो इस प्रदर्शन को दोहरा सके ?



लेख समाप्त करने से पहले एक खबर और देना जरुरी है .1975 में ऋषिकेश मुखर्जी निर्देशित '' चुपके -चुपके ''भी डेविड धवन के निशाने पर आचुकी है. अमिताभ, धर्मेन्द्र , शर्मीला टगोर , और जया बच्चन से सजी इस उम्दा कामेडी के रीमेक के लिए रूमी जाफरी नए सिरे से पटकथा लिख रहे है. मात्र दस लाख के बजट में बनी इस फिल्म के रीमेक का क्या हश्र होगा इस पर किसी और दिन चर्चा करेंगे.

बहरहाल, मील के पत्थर बिखरते देखेंगे ---हम लोग .

Thursday, January 20, 2011

प्रिंस चार्ल्स और डायना के बेटे की शादी


वर्ष 2011 ब्रिटेन के शाही परिवार के लिए एक यादगार साल रहेगा. अप्रैल में महारानी एलिज़ाबेथ का 85वाँ जन्मदिन, जून में उनके पति प्रिंस फ़िलिप की 90वीं सालगिरह और इस सब से बढ़ कर 29 अप्रैल को महारानी के पोते विलियम की केट मिडलटन से शादी.बकिंघम पैलेस के अधिकारी देश के आर्थिक हालात को जानते हुए इस बारे में काफ़ी चौकसी बरत रहे हैं.बडती बेरोजगारी, डटी हुई आर्थिक मंदी के चलते आम जन में सरकार के प्रति गुस्सा तो है परन्तु राज परिवार के लिए स्नेह भी है . अगर जनता को यह सन्देश जाता है कि उनके पसीने के टेक्स को राजा रानी की शादी में उड़ाया जा रहा है तो बात बिगड़ सकती है .

इस विवाह की विलियम के पिता चार्ल्स और माँ डायना के विवाह से तुलना की जाएगी

उनका कहना है कि विलियम का केट से विवाह शायद उनके माता-पिता की तरह का आलीशान आयोजन न हो कर उनकी दादी और दादा के विवाह का प्रतिरूप हो.

शादी में कौन मेहमान शामिल होंगे, इस बारे में अभी कोई ऐलान नहीं हुआ है.

विलियम और केट एक दूसरे को पिछले आठ वर्ष से जानते हैं. दोनों ने जब 16 नवंबर को अपनी सगाई की घोषणा की तो किसी को हैरत नहीं हुई.
बहरहाल, केट मिडलटन के शाही परिवार में शामिल होने को लेकर ब्रितानी उत्सुक भी हैं और प्रतीक्षा भी कर रहे हैं.

उनमें से कुछ को यह उम्मीद भी है कि नई दुलहन 2012 में, महारानी एलिज़ाबेथ के राज्याभिषेक के पचास वर्ष पूरे होने पर, उनकी गोद में एक पड़पोता दे सकें.

Monday, January 17, 2011

हर जगह चीन .


चीन ने विकासशील देशों को कर्ज देने के मामले में विश्व बैंक को पीछे छोड़ दिया है.

फ़ाइनेंशियल टाइम्स के अनुसार चीन के विकास बैंक और आयात-निर्यात बैंक ने पिछले दो वर्षों में 110 अरब डॉलर के ऋण विभिन्न सरकारों और निजी कंपनियों को वितरित किए.

ये विश्व बैंक के ऋण वादों से 10 फ़ीसदी ज्यादा है.

विश्व बैंक ने वित्तीय संकट के दौरान वर्ष 2008 से 2010 के बीच सौ अरब डॉलर के ऋण स्वीकृत किए हैं.विश्लेषकों का कहना है कि ये चीन की आर्थिक ताकत का प्रतीक है. साथ ही ये चीन के विकासशील देशों से बढ़ते संबंधों को भी दर्शाता है.

Sunday, January 2, 2011

पटरी से उतरता एक बादशाह .


नए साल के पहले रविवार टाइम्स ऑफ़ इंडिया के पहले पेज पर फुल पेज का विज्ञापन छपा . यह विज्ञापन था शाहरुख की आने वाली फिल्म रा -वन का. इस में शाहरुख अपनी चिर परिचित मुद्रा में थे . अकड़े हुए . सपाट चेहरा , भाव ऐसे कि '' में किसी कि परवाह नहीं करता '' . अकड़और अहंकार शाहरुख के चरित्र के अहम् हिस्सा बन गए है. हो सकता है रा-वन में उनका किरदार ही भावनाहीन मशीन का हो , परन्तु उनके पिछले सालो के स्वभाव पर नजर डाले तो उनकी छवि सहज सरल अभिनेता की कभी नहीं रही है.

नब्बे के दशक से शाहरुख़ ने सफलता का स्वाद चखना शुरू किया. उनकी फिल्मे बॉक्स ऑफिस पर धन बरसाने लगी .भारत ही नहीं वरन ओवेर्सिस में भी उनकी फिल्मो ने कमाल का व्यवसाय करना शुरू किया . हिंदी सिनेमा में वे पहले सितारे बने जिसकी फिल्मे विदेशो में सबसे ज्यादा कमाई करने लगी , बस यही पर मीडिया ने उन्हें ' बादशाह खान ' से नवाज दिया और इस लेबल ने शाहरुख खान का दिमाग सातवे आसमान पर पहुचा दिया. बडबोला पण उन पर हावी होने लगा और उन्होंने अपने समकालीन अभिनेताओं और सीनियर पर टिपण्णी कर आहत करना शुरू किया. नए साल के मोके पर ब्रिटेन के एक अखबार ने दस घमंडी खिलाडियों की सूची जारी की है. जिसमे हमारे यूवराज सिंह भी शामिल है. ऐसी ही कोई सूची फिल्म अभिनेताओं की बनेगी तो निश्चित तौर पर उसमे शाहरुख पहले पांच में शामिल होंगे.

समकालीन खान अभिनेताओं से उनका पंगा जग जाहिर है . सलमान और आमिर उनके निशाने पर हमेशा से रहे है. मनोविज्ञान का सिद्धांत है कि असुरक्षा की भावना मनुष्य को आक्रमण करने को प्रेरित करती है. परन्तु आज शाहरुख़ इस मुकाम पर आगये है जहां असफलता से डर कोई मायने नहीं रखाता है .शाहरुख बड़े सितारे है परन्तु आदरणीय नहीं है.इस बात को उनके हालिया बयान ने और ज्यादा मजबूत किया है. मौका था करण जोहर के साथ काफी पीने का. यहाँ भी उन्होंने अपने अहंकार का डटकर प्रदर्शन किया और दोनों खान सितारों से दोस्ती के रास्ते बंद कर दिए.
बादशाह के आवरण में लिपटे शाहरुख को यह मानना हित में होगा कि सफलता के संकरे शिखर पर हमेशा नहीं रहा जासकता है..आज नहीं तो कल उन्हें ढलान पर आना ही होगा. और उस समय अहंकारहीन शाहरुख को ही तव्वज्जो मिलेगी जैसी एक जमाने के क्रोधित यूवक अमिताभ को आज अपनी विनम्रता के लिए सर आँखों पर बिठाया हुआ है